
कुंडलिनी साधना अत्यंत जटिल और अनुभवजनित साधना है। बिना पहला अनुभव हुए, न तो अगला अनुभव होगा और न ही आगे की बात समझ आएगी।
समझ शक्ति का उन्नत होता कुंडलिनी साधना के लिए बेहद आवश्यक है और इस साधना का जरूरी अंग भी है। बिना इसके आप समझ ही नहीं पाएंगे कि वास्तव में हो क्या रहा है और होना क्या चाहिए था?
अगर कुंडलिनी सही से उठेगी तो अतिरिक्त चेतना पैदा होगी और अतिरिक्त चेतना की वजह से समझ शक्ति अपने आप ही बढ़ जाएगी। यदि ऐसा नहीं हो रहा तो समझ लीजिए कि कुण्डलिनी सही तरह से नहीं उठी है या यूं कह सकते है कि पूर्णतया नहीं उठी है।

गुरु की आवश्यकता इसलिए कुंडलिनी साधना का आवश्यक अंग है। बिना गुरु के आप इस साधना में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। क्योंकि आपके मन में अचानक उत्पन्न हो रहे विचारों को नियंत्रित करना आवश्यक है जो कुंडलिनी साधना के दौरान उठते ही है। सही गुरु आपके विचारों से कुंडलिनी की अवस्था को समझ लेगा और निर्णय लेगा कि क्या करना चाहिए क्या नहीं।
केवल ध्यान करना मुख्य नहीं है। ध्यान के साथ साथ और भी प्रक्रियाएं करना भी बेहद जरूरी है। लेकिन हर साधक के लिए अतिरिक्त साधनाएं एक जैसी नहीं हो सकती क्योंकि हर साधक एक अलग व्यक्तित्व है। इसलिए हर साधक के लिए कोई एक साधना निश्चित नहीं की जा सकती।


