
वैसे तो हर चक्र कुंडलिनी शक्ति को रोकता है लेकिन मणिपुर चक्र पर कुंडलिनी के अटकने की संभावना सबसे अधिक होती है। क्योंकि यहां वो ऊर्जा है जो केवल और केवल संसार की ओर मोड़ने के लिए बना है। यहां से सुषुम्ना का रास्ता बनाना वास्तव में मुश्किल कार्य होता है।
यहां आमतौर ऊर्जा मणिपुर चक्र को पुष्ट करने लगती है। इसलिए साधक यहां फंस जाता है। साधक को चमत्कारी शक्तियां भी मिलने लगती है। इसलिए साधक अक्सर कुंडलिनी को यहां साधक भूल जाता है।
यहां साधक को सही मार्गदर्शक यानि एक सही गुरु की आवश्यकता होती है। वैसे तो कुंडलिनी साधना की शुरुआत से ही गुरु की आवश्यकता होती है। लेकिन मणिपुर चक्र से आगे तो बिना गुरु के जाना लगभग असंभव होता है।
यहां अक्सर आपका मन आपको गुरु बना देता है। इसलिए कई बार लगता है कि यहां साधक को गुरु की आवश्यकता महसूस नहीं होती। यही वो समय होता है कि साधक की कुंडलिनी यहां मणिपुर चक्र पर अटक जाती है।
इसलिए मणिपुर चक्र पर जब आपको कुंडलिनी जागरण के लक्षण दिखने लगे तो उसी समय सजग हो जाए कि अब समय आ गया है कि आगे सब कुछ गुरु के सानिध्य में ही करना है।
लक्षण कैसे महसूस होगे – जैसे कि मणिपुर चक्र पर वाइब्रेशंस होना। कुंडलिनी पीठ ओर रेंगती हुई मेहसूस होना। इस तरह के और भी लक्षण होते है जो साधक की प्रवृत्ति के हिसाब से अलग अलग होते है।
इसलिए बिना गुरु के यदि हम चलेंगे तो कुछ कदम तो अवश्य चल पाएंगे लेकिन चक्रों को पार करना बिना गुरु के संभव नहीं है।


