Author: Acharya Harish
कुण्डलिनी साधना में सबसे बड़ी चुनौती: पिंगला और इड़ा का संतुलन

कुण्डलिनी शक्ति का रास्ता भटकना
कुण्डलिनी जागरण केवल ऊर्जा का उदय नहीं है, बल्कि यह साधक के लिए संतुलन और सामंजस्य की यात्रा है। असली कठिनाई शक्ति को उसके सही मार्ग – सुषुम्ना नाड़ी – पर बनाए रखना है। इस मार्ग से विचलन का कारण दो सूक्ष्म प्राण शक्तियाँ हैं: पिंगला (सौर ऊर्जा) और इड़ा (चंद्र ऊर्जा)।
क्यों भटकती है कुण्डलिनी?
1. पिंगला और इड़ा का असंतुलन
2. मन में अचानक आक्रामक विचार
3. वासनाओं का प्रकट होना
4. शरीर में असामान्य परिवर्तन
ये संकेत बताते हैं कि साधना में संतुलन बिगड़ रहा है।
गुरु का महत्व

कुण्डलिनी साधना में गुरु का मार्गदर्शन अनिवार्य है।
गुरु साधक के विचारों और शारीरिक परिवर्तनों को देखकर असली कारण समझते हैं और उचित निवारण बताते हैं।
निवारण की प्रक्रिया
1. हर स्थिति का समाधान अलग होता है।
2. साधना के कई पहलू गुप्त रखे जाते हैं।
3. सही निवारण केवल गुरु के मार्गदर्शन में ही संभव है।
निष्कर्ष
कुण्डलिनी साधना का सार केवल ऊर्जा का उदय नहीं, बल्कि पिंगला और इड़ा का संतुलन है।
साधक को अपने विचारों और शरीर के संकेतों पर सजग रहना चाहिए और गुरु के मार्गदर्शन को महत्व देना चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: कुण्डलिनी साधना में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उत्तर: शक्ति को सुषुम्ना मार्ग पर बनाए रखना और पिंगला-इड़ा का संतुलन साधना।
प्रश्न 2: असंतुलन के संकेत कैसे पहचानें?
उत्तर: अचानक आक्रामक विचार, वासनाओं का उदय, और शरीर में असामान्य परिवर्तन।
प्रश्न 3: क्या गुरु के बिना साधना संभव है?
उत्तर: सिद्धांत रूप से संभव है, लेकिन सुरक्षित और स्थिर जागरण के लिए गुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है।
कुण्डलिनी शक्ति खतरनाक क्यों है? 3 बातें जो कोई नहीं बतायेगा.

सिर्फ एक गलती, और कुण्डलिनी मोक्ष नहीं नरक का रास्ता बन सकती है.
अगर आप कुण्डलिनी साधना करते है तो आपको यह बातें अवश्य मालूम होनी चाहिए.
मैं अपनी बात शुरू करूगा मेरे अपने एक शिष्य के अनुभव से, जिसने खुद से कुण्डलिनी साधना शुरू की थी और बाद में ऐसी स्थिति में फंस गया था, जहां खुद से उसका निकालना नामुमकिन था.
शुभम मेरे पास जब आया था तो उसकी कुण्डलिनी मूलाधार चक्र से उठते ही राइट साइड की ओर मुड़ कर स्वाधिष्ठान चक्र पर अपने बैड इफेक्ट (Bad Effects) दिखा रही थी. यह मैंने उसके शरीर को देखते ही समझ गया था. उसके चलने के तरीके से भी मुझे पता चल गया था कि गडबड़ी कहा हुई है.
उसकी रिलेशनशिप अत्याधिक बिगड़ चुकी थी. आर्थिक स्थिति भी खराब हो चुकी थी. वजह कुण्डलिनी का मूलाधार चक्र से ही अपना रास्ता बदल लेना था.
शुभम जो कुछ भी प्रयास करता था विफल हो जाता था. बड़ी खतरनाक स्थिति में फँसा था.
शरीर में भी अजीब तरह के दर्द और असहजता हो रही थी. नींद आती ही नहीं थी.
मैंने शुभम के केस की हर बात को अच्छे से स्टडी किया और उसे कुण्डलिनी के बारे मे 3 बाते बतायी.
यह 3 बातें शुभम को नहीं पता थी और ना ही उसने इन तीन बातों पर कभी अमल नहीं किया था.
3 विशेष बातें
- कुण्डलिनी जब मूलाधार चक्र से ऊपर उठती है तो यह सबसे खतरनाक होती है.
- कुंडलिनी जागरण के दौरान पंच तत्वों से अर्थिंग करना बहुत आवश्यक होता है.
- कुंडलिनी जब बिगड़ जाए तो उसकी हीलिंग करवानी चाहिए.
इन 3 बातों को हर कुण्डलिनी साधक को पता होनी चाहिए. नहीं पता होगा तो शुभम जैसी हालत होगी ही.
हर किसी के लिए अलग समाधान
शुभम की अवस्था को ठीक होने में 3 से 4 महीनों का समय लग गया था. समाधान क्यूंकि हर किसी के लिए अलग होता है, इसलिए समाधान के बारे मे यहां चर्चा नहीं की जा सकती थी.
4 दियों की साधना – धन की देवी की साधना
4 दियों की साधना धन की देवी से संबंधित है. 4 तरह की शक्तियां हमारे मूलाधार चक्र पर हर पल उपस्थित होती है. लेकिन आमतौर पर यह चारों शक्तियां सुप्त अवस्था मे होती है.
इन 4 देवियों में से एक शक्ति धन से संबंधित होती है. इस शक्ति को यदि साध लिया जाए तो जीवन मे धन की कमी नहीं रहती.
लेकिन इस देवी की साधना अन्य 3 देवियों की साधना के साथ की जाती है.
कैसे होती है यह साधना?
इस साधना के लिए हमें 4 दिए, एक पानी से भरा हुआ खुला बर्तन और एक छोटे बर्तन मे चावल की आवश्यकता होती है.
इस साधना में 40 मिनट का समय लगता है. इस साधना में साधक को स्वप्न के माध्यम से देवी दर्शन देती है.
एक खास तरह का सपना
साधना के दौरान यदि साधक को एक खास तरह का सपना आए तो समझो साधना फलीभूत हो रही है. इस सपने मे एक महिला नदी किनारे कार्य करती हुई दिखाई देती है.
साधना के रिजल्ट्स साधना के दौरान ही दिखाई देने लगते हैं. यानि धन संबंधी समस्या साधना के दौरान ही दूर होने लगती है.
साधना की पूरी प्रक्रिया गुरु और साधक के बीच मे गुप्त होती है. मंत्र भी हर साधक के लिए अलग होते है.

रोहिणी नक्षत्र और स्वाधिष्ठान चक्र: कुंडलिनी जागरण का एक गुप्त रहस्य
क्या आप जानते हैं कि ब्रह्मांडीय नक्षत्रों की स्थिति आपकी कुंडलिनी साधना को कितनी गहराई से प्रभावित कर सकती है? आज हम बात करेंगे रोहिणी नक्षत्र की, जो चंद्रमा का नक्षत्र है और इसका कुंडलिनी जागरण में, विशेषकर स्वाधिष्ठान चक्र के भेदन में, क्या महत्व है।
चंद्रमा, जल तत्व और स्वाधिष्ठान चक्र का संबंध
रोहिणी नक्षत्र का स्वामी चंद्रमा है। ज्योतिष और योग विज्ञान के अनुसार, चंद्रमा का सीधा संबंध ‘जल तत्व’ (Water Element) से है। हमारे शरीर में जल तत्व का प्रतिनिधित्व स्वाधिष्ठान चक्र (Sacral Chakra) करता है। यही कारण है कि जब चंद्रमा रोहिणी नक्षत्र में होता है, तो उसका सीधा प्रभाव हमारे स्वाधिष्ठान चक्र पर पड़ता है।
साधक स्वाधिष्ठान चक्र पर क्यों अटक जाते हैं?
कुंडलिनी जागरण की यात्रा में स्वाधिष्ठान चक्र सबसे कठिन पड़ावों में से एक है। यह भावनाओं (Emotions) का केंद्र है। जब कुंडलिनी ऊर्जा इस चक्र पर पहुंचती है, तो साधक के भीतर दबी हुई भावनाएं ज्वार की तरह उमड़ पड़ती हैं।
साधक को अपने ही डर, असुरक्षा और पुरानी दबी हुई भावनाओं से लड़ना पड़ता है। यह मानसिक संघर्ष इतना तीव्र होता है कि कई साधक भयभीत होकर अपनी साधना बीच में ही छोड़ देते हैं।
गुरु और रोहिणी नक्षत्र की भूमिका
यहीं पर एक समर्थ गुरु की आवश्यकता होती है। गुरु जानते हैं कि यह भावनात्मक तूफ़ान आएगा ही। ऐसे समय में, रोहिणी नक्षत्र एक वरदान साबित होता है।
यदि रोहिणी नक्षत्र में पूर्णिमा (Full Moon) का संयोग बन जाए, तो यह स्वाधिष्ठान चक्र से कुंडलिनी को ऊपर उठाने का सबसे स्वर्णिम अवसर होता है। चंद्रमा की पूर्ण ऊर्जा इस चक्र के अवरोधों को खोलने में मदद करती है।
साधना की विधि (The Technique)
हालाँकि, प्रत्येक साधक के संस्कार और ऊर्जा का स्तर अलग होता है, इसलिए इसकी विशिष्ट गुप्त क्रियाएं (Kriyas) गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत ही दी जाती हैं। उन विशेष विधियों के लिए आप हमसे सीधे संपर्क कर सकते हैं।
परंतु, एक सामान्य विधि जिसे साधक अपना सकते हैं, वह इस प्रकार है:
रोहिणी नक्षत्र के दौरान ध्यान में बैठें।
चंद्रमा की शीतल और सौम्य ऊर्जा का आवाहन करें।
इस ऊर्जा को अपने स्वाधिष्ठान चक्र के बिल्कुल मध्य बिंदु (Center) पर केंद्रित करें।
धीरे-धीरे भावना करें कि चंद्रमा की ऊर्जा पूरे चक्र में फैल रही है और उसे शुद्ध कर रही है।
रोहिणी नक्षत्र और चंद्र ऊर्जा का यह अद्भुत मिलन कुंडलिनी को ऊपर की ओर (ऊर्ध्वगामी) ले जाने में चमत्कारी परिणाम देता है।
आपके अनुभव
क्या आपने कभी चंद्रमा की ऊर्जा या रोहिणी नक्षत्र के दौरान ध्यान साधना की है? क्या आपने अपनी भावनाओं में कोई बदलाव महसूस किया है? अपने अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में हमारे साथ अवश्य साझा करें।

मणिपुर चक्र पर कुंडलिनी क्यों अटकती है?

वैसे तो हर चक्र कुंडलिनी शक्ति को रोकता है लेकिन मणिपुर चक्र पर कुंडलिनी के अटकने की संभावना सबसे अधिक होती है। क्योंकि यहां वो ऊर्जा है जो केवल और केवल संसार की ओर मोड़ने के लिए बना है। यहां से सुषुम्ना का रास्ता बनाना वास्तव में मुश्किल कार्य होता है।
यहां आमतौर ऊर्जा मणिपुर चक्र को पुष्ट करने लगती है। इसलिए साधक यहां फंस जाता है। साधक को चमत्कारी शक्तियां भी मिलने लगती है। इसलिए साधक अक्सर कुंडलिनी को यहां साधक भूल जाता है।
यहां साधक को सही मार्गदर्शक यानि एक सही गुरु की आवश्यकता होती है। वैसे तो कुंडलिनी साधना की शुरुआत से ही गुरु की आवश्यकता होती है। लेकिन मणिपुर चक्र से आगे तो बिना गुरु के जाना लगभग असंभव होता है।
यहां अक्सर आपका मन आपको गुरु बना देता है। इसलिए कई बार लगता है कि यहां साधक को गुरु की आवश्यकता महसूस नहीं होती। यही वो समय होता है कि साधक की कुंडलिनी यहां मणिपुर चक्र पर अटक जाती है।
इसलिए मणिपुर चक्र पर जब आपको कुंडलिनी जागरण के लक्षण दिखने लगे तो उसी समय सजग हो जाए कि अब समय आ गया है कि आगे सब कुछ गुरु के सानिध्य में ही करना है।
लक्षण कैसे महसूस होगे – जैसे कि मणिपुर चक्र पर वाइब्रेशंस होना। कुंडलिनी पीठ ओर रेंगती हुई मेहसूस होना। इस तरह के और भी लक्षण होते है जो साधक की प्रवृत्ति के हिसाब से अलग अलग होते है।
इसलिए बिना गुरु के यदि हम चलेंगे तो कुछ कदम तो अवश्य चल पाएंगे लेकिन चक्रों को पार करना बिना गुरु के संभव नहीं है।
कुंडलिनी साधकों के लिए

कुंडलिनी साधना अत्यंत जटिल और अनुभवजनित साधना है। बिना पहला अनुभव हुए, न तो अगला अनुभव होगा और न ही आगे की बात समझ आएगी।
समझ शक्ति का उन्नत होता कुंडलिनी साधना के लिए बेहद आवश्यक है और इस साधना का जरूरी अंग भी है। बिना इसके आप समझ ही नहीं पाएंगे कि वास्तव में हो क्या रहा है और होना क्या चाहिए था?
अगर कुंडलिनी सही से उठेगी तो अतिरिक्त चेतना पैदा होगी और अतिरिक्त चेतना की वजह से समझ शक्ति अपने आप ही बढ़ जाएगी। यदि ऐसा नहीं हो रहा तो समझ लीजिए कि कुण्डलिनी सही तरह से नहीं उठी है या यूं कह सकते है कि पूर्णतया नहीं उठी है।

गुरु की आवश्यकता इसलिए कुंडलिनी साधना का आवश्यक अंग है। बिना गुरु के आप इस साधना में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। क्योंकि आपके मन में अचानक उत्पन्न हो रहे विचारों को नियंत्रित करना आवश्यक है जो कुंडलिनी साधना के दौरान उठते ही है। सही गुरु आपके विचारों से कुंडलिनी की अवस्था को समझ लेगा और निर्णय लेगा कि क्या करना चाहिए क्या नहीं।
केवल ध्यान करना मुख्य नहीं है। ध्यान के साथ साथ और भी प्रक्रियाएं करना भी बेहद जरूरी है। लेकिन हर साधक के लिए अतिरिक्त साधनाएं एक जैसी नहीं हो सकती क्योंकि हर साधक एक अलग व्यक्तित्व है। इसलिए हर साधक के लिए कोई एक साधना निश्चित नहीं की जा सकती।
Why Does the Mind Wander During Meditation?
“Who is the biggest obstacle in meditation?

The mind itself.”
It’s the same mind that draws us toward meditation, and it’s also the first to distract us.
Do You Experience This?
The moment you close your eyes, thoughts start racing?
Old fears or regrets suddenly appear?
You sit for 5 minutes and find 10 minutes of restlessness?
If yes, you’re not alone.
This is the common experience of every seeker who sincerely sits to go within.
Why Does the Mind Wander?
1. It’s the Nature of the Mind to Move
The energy of the mind constantly jumps from one thought to another – like a monkey swinging from tree to tree.
2. Hidden Thoughts Begin to Surface
As soon as we sit in silence, suppressed subconscious thoughts rise to the surface.
We try to push them away, but they are trying to leave.
It’s like washing your face – the dirt first becomes visible.
3. Unsteady Breath and Physical Discomfort
If your breath is irregular or your body is tense, the mind cannot calm down.
Breath and mind are deeply connected – like a river and its current.
What Does Science Say?
Yes, neuroscience supports this:
During meditation, the brain shifts from Beta waves (active thinking) to Alpha and eventually Theta waves (deep relaxation).
But when the mind is restless, this shift doesn’t happen.
True meditation begins when brain waves slow down and become gentle — that’s when peace arises.
So, What’s the Solution? Can We Stop the Mind?
❌ Truth #1:
Meditation is not about stopping the mind.
✅ Real solution:
Learn to watch the mind, not fight it.
1. Anchor Your Attention to the Breath
You can’t control the mind directly, but you can control your breath.
Gentle, deep breathing naturally brings stability to the mind.
2. Let Thoughts Come – Just Don’t Follow Them
Observe thoughts like trains passing a platform.
You’re the watcher on the platform – not the passenger on the train.
3. Use a Mantra or Inner Sound
A mantra or a soft inner sound helps the mind stay centered and reduces drift.
4. Start with Guided Meditation
For beginners, guided meditation is the most effective and effortless way to build inner focus.
From My Experience…
When I first tried meditating, I felt I was doing nothing “right.”
But over time, I simply stayed with the breath and stopped resisting thoughts.
Soon, a quiet clarity began to emerge.
Meditation is not a goal – it’s the art of letting go.
✅ Ready to Begin Your Inner Journey?
I’ve created a 4-month Guided Meditation Course,
where we explore the mind, breath, chakras, stillness, and inner witness – one step at a time.
Talk to me on WhatsApp 9315835440
Final Thought:
Watching the mind – without fighting it – is the true beginning of meditation.
The mind may wander today – it may settle tomorrow –
and one day, it will become your companion.
All it takes is one courageous step… inward.
ध्यान करते समय मन क्यों भटकता है – कारण, विज्ञान और समाधान
“ध्यान का सबसे बड़ा विरोधी कौन है?
स्वयं मन।”
यह वही मन है जो हमें ध्यान की ओर खींचता भी है, और सबसे पहले वहाँ से भटकाता भी है।
🔍 क्या यह आपके साथ होता है?
आँखें बंद करते ही विचारों की भीड़ शुरू हो जाती है?
कोई पुरानी बात या डर दोबारा सामने आ जाता है?
5 मिनट बैठते हैं और 10 मिनट की बेचैनी मिलती है?
अगर हाँ, तो आप अकेले नहीं हैं।
यह हर उस साधक के साथ होता है, जो पहली बार अपने भीतर उतरने की कोशिश करता है।
🧠 मन क्यों भटकता है?
1. मन का स्वभाव ही गति है
मन की ऊर्जा हर समय एक विचार से दूसरे विचार की ओर दौड़ती है।
जैसे एक बंदर पेड़ों से झूलता है – मन भी अनुभवों से, स्मृतियों से, और कल्पनाओं से झूलता रहता है।
2. अनदेखे विचारों की सफाई शुरू होती है
ध्यान में बैठते ही भीतर छिपे अवचेतन विचार (subconscious) सतह पर आने लगते हैं।
हम उन्हें रोकना चाहते हैं, लेकिन वे निकलने की कोशिश करते हैं – जैसे मुँह पर लगाए मिट्टी-पाउडर को पानी से धोते समय गंदगी पहले बाहर आती है।
3. साँस की अस्थिरता और शारीरिक बेचैनी
अगर आपकी साँसें अनियमित हैं या शरीर तनाव में है, तो मन भी शांत नहीं हो सकता।
मन और प्राण गहरे जुड़े हैं – जैसे नदी और उसकी धाराएँ।
🧪 क्या विज्ञान भी यही कहता है?
जी हाँ।
ध्यान के समय मस्तिष्क की Beta waves धीरे-धीरे Alpha और फिर Theta waves में बदलती हैं।
लेकिन जब मन बेचैन होता है, तो ये शिफ्ट नहीं हो पाती – और विचारों की दौड़ जारी रहती है।
ध्यान में सफलता तभी है जब ब्रेन वेव्स धीमी और लहरदार हो जाएँ – यही शांति की अवस्था है।
🛠️ समाधान क्या है? मन को कैसे रोका जाए?
❌ पहला सच:
“मन को रोकना ध्यान नहीं है।”
✅ सच्चा उपाय:
“मन को देखना सीखिए, रोकीए मत।”
1. साँस पर टिकें
मन को आप नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन साँस को कर सकते हैं।
धीरे-धीरे गहरी और सहज साँसें लें – मन खुद स्थिर होने लगेगा।
2. विचारों को आने दें, पर साथ न जाएँ
जो भी विचार आए, उसे देखें।
सोचिए कि आप ट्रेन में नहीं बैठे हैं, बस प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं और ट्रेनें (विचार) गुजर रही हैं।
3. मंत्र या ध्यान ध्वनि का सहारा लें
एक आंतरिक ध्वनि या गुरु मंत्र पर ध्यान केंद्रित करने से मन भटकाव से वापिस आता है।
4. Guided Meditation से शुरुआत करें
शुरुआती साधकों के लिए गाइडेड ध्यान सबसे सरल और प्रभावशाली तरीका है।
🙋♂️ मेरे अनुभव में…
जब मैंने पहली बार ध्यान किया, तो मुझे लगा मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा।
पर जैसे-जैसे मैं सिर्फ साँसों पर टिका, और विचारों को रोके बिना देखना शुरू किया – कुछ सप्ताहों में भीतर शांति और स्पष्टता का एक नया अनुभव शुरू हुआ।
🌿 ध्यान कोई लक्ष्य नहीं है, यह मन को छोड़ने की कला है।
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जहाँ आप मन, प्राण, चक्र और मौन – इन सभी स्तरों पर ध्यान सीखते हैं।
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📌 समापन:
मन को देखना, उससे लड़ना नहीं,
यही सच्चा ध्यान है।
मन आज भटकेगा – कल शांत होगा – और एक दिन वही आपका मित्र भी बन जाएगा।
बस पहला कदम उठाना होगा…

How to awake Kundalini
Kundalini is a secret divine power which exist in every human being irrespective of any religion and race.
Everyone can awaken this divine power when he want to explore divine world within him.
Spiritual Progress
Kundalini will take you into realm of spirituality. So, you must know that before working upon it that you will not get any worldly power.
You will revealed to another parallel world of spirituality around you.
How to start kundalini awakening?
Concentration is the key point if you want to start kundalini sadhna.
There are many methods to enhance the level of concentration. In my opinion yoga nidra and tratak are best practices to gain level of concentration with purity of the mind.
Purity of mind is another aspects which is mandatory to awaken kundalini power.
If you gain concentration without purity of mind you can’t go forward in right direction.
How to uplift kundalini
Kundalini is residing in sushmna nadi at root chakra. When we apply concentration at root chakra, it boost prana in sushmna nadi and kundalini get uplifted.
But it is not easy to uplift it because at the same point of root chakra 2 more nadis are there which are meant to through your concentration and awareness outwardly.
But by regular practices under the guidance of a self realised guru we can achieve it.
How to cross different segments
There are different segments those you have to cross to awaken kundalini fully.
A segment means the path between the two chakras. For example first segment is the path between root chakra to sacral chakra. When you cross this segment many spiritual things revealed to you. Many fears will be disappear from your life.
So, every segment after crossing will give you a lot to ease your life.
Kundalini awakening is a long spiritual journey which gradually and slowly turn in your life into the magical world of spirituality.
Consciousness
Consciousness start developing when kundalini crosses it first segment. This is the another most important part of kundalini awakening. Without consciousness there is no chance to go upward with kundalini.
The Significance of Healing During Navratri
Healing can take various forms. Taking medicine is also a kind of healing. Anything that helps you recover from an illness or a miserable state is called healing.
In spirituality, energy healing is practiced, commonly known as healing.
The Human Aura
The aura surrounding a person is not static; it changes constantly. Sometimes, due to the negative thoughts within, this aura becomes so negative that we fall prey to mental or physical illnesses. Our aura is composed of various types of human energies. Once it becomes imbalanced, it requires external energy to restore balance. The process of providing this external energy is known as healing.
Who can heal?
Only those who possess an abundant amount of spiritual energy and know how to transfer this energy to others can perform healing.
Navratri Healing
During Navratri, healing works exceptionally well. The healer can easily transfer its benefits to those in need because the atmosphere is filled with spiritual energy during this period. This spiritual energy benefits both the healer and the one receiving the healing.
How Many Days Are Auspicious?
From Navratri to Diwali, and even the entire month of Kartik, all these days are highly auspicious for healing. These days are also beneficial for spiritual practices. During this time, one can heal themselves by removing negative energies from within. While healing can be done at any time, this period is the most suitable for receiving healing energy.

Healing with Beeja Mantra
There are many seed mantras associated with Goddess Durga that can aid in healing. These seed mantra are beeja mantra. These mantras become especially powerful during this period. Those who are knowledgeable in this practice can use these mantras to benefit both themselves and others.