Author: Acharya Harish
आकाश तत्व साधना: ब्रह्मांड की रहस्यमई शक्तियों को जाग्रत करने का मार्ग
पंचतत्वों में यदि कोई तत्व सबसे अधिक रहस्यमई और अनंत संभावनाओं से भरा है, तो वह है आकाश तत्व। प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनि और साधक इस तत्व की साधना कर ऐसी सिद्धियां प्राप्त करते रहे हैं, जो सामान्य मनुष्य के लिए कल्पना से परे हैं।
आकाश तत्व क्या है? (What is Akash Tattva?)
अक्सर लोग आकाश तत्व को केवल नीला आसमान समझने की भूल करते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक सूक्ष्म है।
- यह कोई देवता नहीं है: आकाश तत्व कोई व्यक्ति विशेष या देवता नहीं, बल्कि एक सर्वव्यापी ऊर्जा (Cosmic Energy) है।
- सूक्ष्म उपस्थिति: इसी सूक्ष्म आकाश तत्व से दृश्य आकाश का निर्माण हुआ है।
- सर्वव्यापी: यह आपके शरीर के भीतर भी है और शरीर के बाहर पूरे ब्रह्मांड में भी। यह वह ‘खाली स्थान’ है जिसमें अन्य चारों तत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) निवास करते हैं।
विशुद्धि चक्र और स्पिरिचुअल गाइड्स का मिलन
योग विज्ञान के अनुसार, हमारे शरीर का विशुद्धि चक्र (Throat Chakra) सीधे तौर पर आकाश तत्व से जुड़ा है।
एक गहरा रहस्य: जब कोई साधक अपने विशुद्धि चक्र को जागृत करता है, तो वह भौतिक जगत से ऊपर उठकर आध्यात्मिक जगत (Astral Plane) से जुड़ जाता है। यहीं पर आपकी मुलाकात आपके स्पिरिचुअल गाइड्स (Spiritual Guides) से होती है।
विभिन्न सभ्यताओं में इन गाइड्स को अलग-अलग नामों से जाना जाता है, लेकिन इनका उद्देश्य एक ही है—साधक को सही दिशा दिखाना और उसे रहस्यमई विद्याओं में पारंगत करना।
आकाश तत्व की साधना से क्या प्राप्त होता है?
आकाश तत्व की महिमा अपरंपार है। चूंकि यह तत्व अन्य सभी नीचे के चक्रों (मूलाधार से अनाहत तक) को नियंत्रित करता है, इसलिए इसमें सब कुछ देने की शक्ति है:
- सर्वस्व की प्राप्ति: जो कुछ भी इस आकाश के नीचे मौजूद है, उसे प्राप्त करने की क्षमता आपमें आ जाती है।
- जीवन में संतुलन: साधना सिद्ध होने पर आपके जीवन की बागडोर आपके स्पिरिचुअल गाइड्स के हाथों में आ जाती है, जिससे जीवन में अभूतपूर्व संतुलन आता है।
- आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति: यह साधना न केवल आपको अपार धन-धान्य दिला सकती है, बल्कि आपको आध्यात्मिकता के शिखर पर भी ले जाती है।
- रहस्यमई विद्याओं का ज्ञान: ब्रह्मांड की गुप्त विद्याएं और प्रक्रियाएं आकाश तत्व के माध्यम से ही सीखी जा सकती हैं।
साधना की विधि: शुरुआत कैसे करें?
आकाश तत्व की साधना सीधे तौर पर नहीं की जाती, इसके लिए एक व्यवस्थित मार्ग अपनाना होता है:
1. तत्व शुद्धि (Purification of Elements)
किसी भी उच्च साधना से पहले तत्व शुद्धि अनिवार्य है। इसमें पांचों तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) को शुद्ध किया जाता है। जब तक शरीर के तत्व शुद्ध नहीं होंगे, तब तक ऊर्जा का प्रवाह सही नहीं होगा।
2. चक्र साधना (Chakra Meditation)
चूंकि आकाश तत्व का केंद्र विशुद्धि चक्र है, इसलिए साधक को चक्र साधना पर ध्यान केंद्रित करना होता है। विशेष बीज मंत्रों और ध्यान की गहराई से इस चक्र को सक्रिय किया जाता है।
3. विशिष्ट आकाश साधना
तत्व शुद्धि और चक्र जागृति के बाद ही आकाश तत्व की विशेष साधना की जाती है, जिससे साधक ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ एकाकार (Align) हो जाता है।
निष्कर्ष
आकाश तत्व की साधना जीवन को पूर्णतः रूपांतरित करने की क्षमता रखती है। यह आपको केवल शक्तिशाली ही नहीं बनाती, बल्कि आपको ब्रह्मांड के उस सत्य से जोड़ती है जहाँ सब कुछ संभव है। यदि आप अपने जीवन में शांति, समृद्धि और उच्च आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में हैं, तो आकाश तत्व की शरण में आना ही एकमात्र मार्ग है।
क्या आपने कभी अपने विशुद्धि चक्र की ऊर्जा को महसूस किया है? अपने अनुभव नीचे कमेंट्स में साझा करें।
थर्ड आई 👁️ पर अलग अलग रंग दिखने का महत्व

जब हम थर्ड आई यानि कि तीसरे नेत्र पर ध्यान करना आरम्भ करते है तो कुछ समय बाद हमें वहां प्रकाश दिखने लगता हैं। शुरुआत में आमतौर पर हल्का स्लेटी रंग का होता है। यानि सफेद प्रकाश काले प्रकाश में मिक्स होता सा दिखाई देता हैं। कुछ लोगों को शुरुआत में सफेद, स्लेटी और काले रंग की गुफा नुमा आकृति दिखाई देती हैं।
ध्यान में बंद आंखों से दिखने वाले रंगों का अपना महत्व होता हैं। आइए जानते है कि ध्यान में दिखने वाले रंगों का क्या मतलब होता है:-
लाल रंग का दिखना
जब साधक को ध्यान में थर्ड आई पर लाल रंग ♥️ दिखता है तो इसका मतलब यह होता है कि उसका मूलाधार चक्र विकसित हो रहा है। इस समय साधक के औरा यानि आभामंडल में बदलाव शुरू हो रहा होता है।
नारंगी रंग का दिखना
जब साधक को ध्यान में थर्ड आई पर नारंगी रंग 🍊 दिखता है तो इसका मतलब यह होता है कि उसका स्वाधिष्ठान चक्र एक्टिव हो रहा है। इस समय साधक के औरा यानि आभामंडल आकर्षित करने वाला होता है।
पीले रंग का दिखना
जब साधक को ध्यान में थर्ड आई पर पीला रंग 🟡 दिखता है तो इसका मतलब यह होता है कि साधक का मणिपुर चक्र पर ऊर्जा पहुंच रही है। इस समय साधक के औरा यानि आभामंडल स्ट्रांग हो रहा होता है।
हरे रंग का दिखना
जब साधक को ध्यान में थर्ड आई पर हरा रंग 🍏 दिखता है तो इसका मतलब यह होता है कि साधक के अनाहत चक्र में फैलाव हो रहा है। इस समय साधक के औरा यानि आभामंडल आत्मिक हो रहा होता है।
नीले रंग का दिखना
जब साधक को ध्यान में थर्ड आई पर नीला रंग 🔵 दिखता है तो इसका मतलब यह होता है कि उसका विशुद्ध चक्र शुद्ध हो रहा होता है। इस समय साधक के औरा यानि आभामंडल दिव्य शक्तियों से जुड़ रहा होता है।
चमकीले नीले रंग का दिखना
जब साधक को ध्यान में थर्ड आई पर चमकीला रंग 🩵 या सफेद रंग 👁️ दिखता है तो इसका मतलब यह होता है कि उसका आज्ञा चक्र विकसित हो रहा है। इस समय साधक को उसके औरा यानि आभामंडल के माध्यम से दूर दर्शन भी होने लगते है।
बैंगनी रंग का दिखना
जब साधक को ध्यान में थर्ड आई पर बैंगनी रंग 💜 दिखता है तो इसका मतलब यह होता है कि उसका सहस्रार चक्र विकसित हो रहा है। इस समय साधक के औरा यानि आभामंडल परिपूर्ण हो रहा होता है।
इस प्रकार से साधक को ध्यान में विभिन्न रंग दिखते है।
इसके अतिरिक्त कई तरह की आकृतियां ध्यान में दिखाई देती है। उनके भी गहरे मतलब होते है। अगले लेख में आपको ध्यान में दिखने वाली आकृतियों के बारे में बताया जाएगा..
क्रमशः
कितने दिनों में कुण्डलिनी जागरण शुरू होता है?
कुंडलिनी एक ऐसी शक्ति है जो हर मानव के भीतर विराजमान है फिर चाहे वो किसी भी धर्म से संबंधित हो। दुनियां भर में बहुत सारे लोग कुण्डलिनी जागरण के इच्छुक होते है। उनमें से बहुत सारे लोग प्रयास भी करते है लेकिन सफल केवल कुछ लोग हो हो पाते है।
बहुत सारे लोगों के मनों में यह एक प्रश्न बार-बार आता है कि वो यदि इस प्रक्रिया को शुरू करें तो कितने दिन लग जाएंगे जागरण में! लेकिन आमतौर पर इस प्रश्न का जवाब उन्हें कहीं लिखा नहीं मिलता न ही कोई वीडियो इसके बारे में सही समय बताता है।
कुंडलिनी जागरण का मतलब क्या है?
यह बात हर एक साधक को जाननी चाहिए कि आखिर कुंडलिनी जागरण का मतलब है क्या। क्या कुण्डलिनी जागृत होते ही सभी चक्रों को पार कर सहस्त्रार चक्र को क्रॉस करके पूर्ण ऊर्जा में समा जाती है? या फिर कुछ और होता है?
कुंडलिनी जागरण का मतलब होता है कि कुंडलिनी अपने मूल स्थान को छोड़ कर सुषुम्ना नाड़ी में गतिशील हो जाए। यह एक शुरुआती प्रक्रिया है और सामान्य शब्दों में इसे ही कुण्डलिनी जागरण कहते है।
वास्तिक कुंडलिनी जागरण क्या होता है?
वास्तविक कुंडलिनी जागरण शिव और शक्ति का मिलन है। वो मिलन तब ही मुमकिन हो सकता है जब कुण्डलिनी सभी पड़ावों को पार करके सहस्त्रार चक्र को पार करके पूर्ण सत्य स्वरूप शिव से मिल जाए। यानि शिवा और शिव एक हो जाएं।
कितना समय लगेगा कुंडलिनी जागरण में
याद रखिए कुंडलिनी जागरण का मतलब है कि साधक कुण्डलिनी को मूलाधार चक्र से गति देकर ऊपर की ओर ले जाने में सक्षम हो जाए। हालांकि कि कुछ लोग इसे आंशिक कुंडलिनी जागरण का नाम भी देते है।
यदि आप नियमित रूप से 90 दिनों तक अपनी एकाग्रता को शुद्ध करके मूलाधार पर कुंडलिनी प्रक्रिया संख्या 1 का प्रयोग करते है तो कुण्डलिनी मूलाधार चक्र को छोड़ देगी और कुंडलिनी जागरण हो जायेगा। लेकिन याद रखे इसे भूल से भी पूर्ण कुण्डलिनी जागरण नहीं मान लीजिएगा। क्योंकि रास्ता लंबा है और अभी आगे भी जाना है।
कई साधक ऐसे भी होते है जिनका मूलाधार चक्र जल्दी से कुंडलिनी को छोड़ता नहीं है। उन्हें यदि 90 दिन में रिजल्ट्स नहीं मिलता तो फिर उन साधकों को कुण्डलिनी प्रक्रिया संख्या 2 का प्रयोग करना पड़ता है। लगभग सभी साधकों की कुण्डलिनी पहली 2 प्रक्रियाओं से जागृत हो जाती है।
मेरे अनुभव में अभी तक एक भी साधक नहीं आया है जिसकी कुण्डलिनी को तीसरी प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ी हो।
आप अपने विचार कमेंट बॉक्स में सांझा कर सकते है। हमसे संपर्क करने के लिए 9315835440 पर व्हाट्सएप या टेलीग्राम मैसेज करें।
क्या सच में ‘कुंडलिनी’ आपको पागल कर सकती है? जानिए इस महाशक्ति का रहस्य और हकीकत

आजकल अध्यात्म और योग की लोकप्रियता के साथ ‘कुंडलिनी’ (Kundalini) शब्द हर किसी की जुबान पर है। जहाँ कुछ लोग इसे परम आनंद और महाशक्ति का द्वार मानते हैं, वहीं सोशल मीडिया पर ऐसी चेतावनियों की भी भरमार है कि यह इंसान को ‘पागल’ कर सकती है।
क्या वाकई कुंडलिनी जागरण खतरनाक है? चलिए, इस रहस्य से पर्दा उठाते हैं और विज्ञान व अध्यात्म के नजरिए से इसकी वास्तविकता को समझते हैं।
1. क्या कुंडलिनी ‘पागल’ करती है? (भ्रम बनाम वास्तविकता)
सीधा और स्पष्ट जवाब है— नहीं। कुंडलिनी स्वयं आपको पागल नहीं करती, बल्कि इसका गलत या अधूरा अभ्यास आपके तंत्रिका तंत्र (Nervous System) के लिए घातक हो सकता है।
इसे एक सरल उदाहरण से समझते हैं:
”यदि आप अपने घर के साधारण बल्ब में अचानक 10,000 वोल्ट का करंट प्रवाहित कर दें, तो क्या होगा? बल्ब फ्यूज हो जाएगा और वायरिंग जल जाएगी।”
ठीक यही हमारे शरीर के साथ होता है। हमारा मस्तिष्क और नाड़ियाँ एक निश्चित ऊर्जा को संभालने के आदी होते हैं। जब कोई व्यक्ति बिना तैयारी के, केवल YouTube वीडियो या अधूरी किताबों के आधार पर तीव्र प्राणायाम या बीज मंत्रों का अभ्यास करता है, तो शरीर उस ‘हाई वोल्टेज’ ऊर्जा को संभाल नहीं पाता। इसी स्थिति को आधुनिक मनोविज्ञान में ‘कुंडलिनी सिंड्रोम’ (Kundalini Syndrome) कहा जाता है।
2. ‘पागलपन’ जैसे दिखने वाले लक्षण क्यों आते हैं?
जब कुंडलिनी ऊर्जा अनियंत्रित होकर मस्तिष्क की ओर बढ़ती है, तो साधक को कुछ ऐसे अनुभव होते हैं जो बाहरी दुनिया को ‘मानसिक बीमारी’ जैसे लग सकते हैं:
- अत्यधिक अनिद्रा: ऊर्जा का स्तर इतना बढ़ जाना कि नींद पूरी तरह गायब हो जाए।
- शारीरिक अनैच्छिक क्रियाएं: शरीर में अचानक झटके लगना या गर्मी महसूस होना।
- इंद्रियों का अति-सक्रिय होना: अजीब आवाजें सुनाई देना या तीव्र प्रकाश दिखना।
- भावनात्मक उतार-चढ़ाव: बिना कारण अत्यधिक खुशी या गहरा अवसाद महसूस होना।
- वास्तविकता से कटाव: खुद को दुनिया से अलग या भ्रम की स्थिति में पाना।
ये लक्षण पागलपन नहीं, बल्कि ऊर्जा का असंतुलन हैं। यह संकेत है कि आपके शरीर का ‘वायरिंग सिस्टम’ अभी उस शक्ति के लिए तैयार नहीं है।
3. यह मार्ग कब खतरनाक हो जाता है?
कुंडलिनी साधना तब जोखिम भरी हो जाती है जब:
- अहंकार (Ego): यदि आप इसे किसी ‘सुपरपावर’ को पाने या दूसरों से श्रेष्ठ दिखने का जरिया समझते हैं।
- गुरु का अभाव: जब आपके पास कोई ऐसा अनुभवी मार्गदर्शक न हो जो यह बता सके कि जाग्रत ऊर्जा को सही दिशा में कैसे मोड़ना है।
- पूर्व मानसिक स्थिति: यदि कोई व्यक्ति पहले से ही गंभीर अवसाद या सिज़ोफ्रेनिया जैसी स्थितियों से जूझ रहा है, तो तीव्र साधना उसकी स्थिति बिगाड़ सकती है।
4. सुरक्षित जागरण का सही तरीका क्या है?
अध्यात्म कोई ‘शॉर्टकट’ या रेस (Race) नहीं है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार, कुंडलिनी छेड़ने से पहले खुद को एक ‘सुयोग्य पात्र’ बनाना अनिवार्य है:
- शरीर की शुद्धि: सात्विक आहार और नियमित योग से शरीर को विषमुक्त करना।
- मन की शुद्धि (Psychological Balance): क्रोध, लोभ और ईर्ष्या पर नियंत्रण पाना।
- नाड़ी शोधन: प्राणायाम के जरिए अपनी ऊर्जा वाहिकाओं को इतना मजबूत बनाना कि वे उच्च चेतना को झेल सकें।
- धैर्य और समर्पण: यह रातों-रात होने वाला चमत्कार नहीं, बल्कि वर्षों का अनुशासन है।
निष्कर्ष
कुंडलिनी साक्षात ‘चेतना’ है, जिसे भारतीय परंपरा में ‘माँ’ का दर्जा दिया गया है। कोई माँ अपने बच्चे को कभी नुकसान नहीं पहुँचाती। समस्या ‘शक्ति’ में नहीं, बल्कि हमारे अधूरे ज्ञान और जल्दबाजी में है।
यदि आप इस मार्ग पर चलना चाहते हैं, तो पहले खुद को एक मजबूत ‘पात्र’ (Container) बनाइए। जब पात्र मजबूत होगा, तभी वह अमृत को संभाल पाएगा। बिना गुरु और बिना तैयारी के कुंडलिनी जागरण की कोशिश करना वैसा ही है जैसे जलते हुए अंगारे को नंगे हाथों से पकड़ना।
नोट: यदि आप योग या ध्यान की शुरुआत कर रहे हैं, तो हमेशा किसी प्रमाणित योग गुरु के सानिध्य में ही अभ्यास करें।
त्राटक और कुंडलिनी जागरण: एकाग्रता से शक्ति के उदय तक का मार्ग

अध्यात्म की यात्रा में त्राटक और कुंडलिनी जागरण दो ऐसी महत्वपूर्ण विधाएं हैं, जो एक-दूसरे की पूरक हैं। अक्सर साधक यह प्रश्न करते हैं कि क्या केवल एकाग्रता से शक्ति का जागरण संभव है? इसका उत्तर त्राटक की सूक्ष्म शक्तियों में छिपा है।
त्राटक: एक साधना, दो परिणाम
त्राटक मात्र एक दृष्टि अभ्यास नहीं है, बल्कि यह एक साथ दो स्तरों पर कार्य करता है:
- मानसिक शुद्धि: यह मन के विकारों और चंचलता को शांत कर उसे निर्मल बनाता है।
- एकाग्रता (Concentration): यह आपकी संकल्प शक्ति और फोकस को उस सीमा तक बढ़ा देता है जहाँ असंभव भी संभव हो जाता है।
कुंडलिनी जागरण में एकाग्रता का रहस्य
कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया मूलाधार चक्र से आरंभ होती है। सामान्यतः ऊर्जा का मार्ग यानी ‘सुषुम्ना नाड़ी’ अवरुद्ध होती है, जिसके कारण कुंडलिनी शक्ति एक सुप्त अवस्था में रहती है।
इस मार्ग की बाधाओं को हटाने के लिए जिस ‘चाबी’ की आवश्यकता होती है, वह है— शुद्ध एकाग्रता। * शुद्धता: जो मन की शुद्धि से आती है।
- एकाग्रता: जो निरंतर त्राटक के अभ्यास से सिद्ध होती है।
जब हम त्राटक से प्राप्त इस “शुद्ध एकाग्रता” को मूलाधार चक्र पर केंद्रित करते हैं, तो सुषुम्ना मार्ग में स्पंदन (Vibrations) शुरू हो जाते हैं। यदि इसके साथ संबंधित चक्र के बीज मंत्र का समावेश कर दिया जाए, तो कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर उर्ध्वगमन (ऊपर की ओर बढ़ना) के लिए तैयार हो जाती है।
चक्र भेदन और निरंतरता
कुंडलिनी का मार्ग केवल मूलाधार तक सीमित नहीं है। स्वाधिष्ठान से लेकर सहस्रार तक, हर पड़ाव पर मार्ग को सुगम बनाने के लिए वही शुद्ध एकाग्रता कार्य करती है। इसीलिए, कुंडलिनी साधना के दौरान बीच-बीच में त्राटक का अभ्यास करते रहना अनिवार्य है, ताकि चेतना की धार कम न पड़े।
मेरा अनुभव: मैंने अपने मार्गदर्शन में कई साधकों को देखा है जिनकी कुंडलिनी शक्ति वर्षों से एक ही चक्र पर अटकी हुई थी। लेकिन जैसे ही उन्होंने सही विधि से त्राटक और एकाग्रता का प्रयोग किया, उनकी ऊर्जा का प्रवाह पुनः सक्रिय हो गया।
⚠️ महत्वपूर्ण चेतावनी: गुरु का सान्निध्य अनिवार्य
त्राटक और कुंडलिनी, दोनों ही अत्यंत शक्तिशाली और रहस्यमयी विद्याएं हैं।
- इन्हें स्वयं से या केवल पढ़कर करने का प्रयास न करें।
- साधना के दौरान होने वाले अनुभव व्यक्तिगत और अप्रत्याशित होते हैं।
- केवल एक अनुभवी गुरु ही आपके अनुभवों का विश्लेषण कर आपको सही दिशा दिखा सकते हैं और आने वाले खतरों से आपकी रक्षा कर सकते हैं।
क्या आप अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू करना चाहते हैं? यदि आप त्राटक की सही विधि या कुंडलिनी साधना के बारे में विस्तार से चर्चा करना चाहते हैं, तो आप मुझसे संपर्क कर सकते हैं।
कुंडलिनी जागरण: चेतना की उत्पत्ति की आध्यात्मिक प्रक्रिया

🔥 कुंडलिनी क्या है?
कुंडलिनी योग में “कुंडलिनी” को एक सुप्त आध्यात्मिक ऊर्जा माना जाता है, जो मूलाधार चक्र में स्थित होती है। यह ऊर्जा सर्प के समान कुंडलित अवस्था में रहती है और जब जागृत होती है, तो शरीर के सात चक्रों से होकर सहस्रार तक पहुँचती है — जहाँ ब्रह्म चेतना से मिलन होता है।
🌟 मूलाधार चक्र से चेतना का उदय
जब कुंडलिनी अपने स्थान मूलाधार चक्र को छोड़ती है, तो केवल ऊर्जा ही नहीं, चेतना भी उत्पन्न होती है। यह चेतना व्यक्ति के भीतर गहराई से कार्य करती है:
- शारीरिक स्तर पर: ऊर्जा का प्रवाह, शरीर में हल्कापन और स्फूर्ति।
- मानसिक स्तर पर: विचारों में स्पष्टता, एकाग्रता और आत्मनिरीक्षण।
- भावनात्मक स्तर पर: भय, क्रोध, लोभ जैसे भावों का क्षय।
- आध्यात्मिक स्तर पर: आत्मसाक्षात्कार की ओर पहला कदम।
🧘 चक्रों की यात्रा: चेतना का मार्ग चक्र स्थान चेतना पर प्रभाव मूलाधार रीढ़ का आधार अस्तित्व और सुरक्षा स्वाधिष्ठान नाभि के नीचे भावनाएँ और सृजन मणिपुर नाभि आत्मबल और इच्छाशक्ति अनाहत हृदय प्रेम और करुणा विशुद्धि गला अभिव्यक्ति और सत्य आज्ञा भृकुटि अंतर्ज्ञान सहस्रार सिर का शीर्ष ब्रह्म चेतना
✨ कुंडलिनी जागरण के संकेत
- ध्यान में गहराई और स्थिरता
- शरीर में कंपन या ऊर्जा का अनुभव
- स्वप्नों में दिव्य संकेत
- जीवन के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन
चेतना का महत्व
चेतना से एक अलग तरह की समझ शक्ति पैदा होती है। यही समझ शक्ति आपको जीवन में भी रास्ता दिखाती है।
जैसे-जैसे कुंडलिनी ऊपर की ओर बढ़ती है तो चेतना के स्तर भी बदलने लगते है। एक समय ऐसा भी आता है कि साधक का संपर्क उच्च चेतना से होने लगता है। उस समय आपको बहुत कुछ अपने आप ही समझ आना शुरू हो जाता है।
⚠️ सावधानी और मार्गदर्शन
कुंडलिनी जागरण एक अत्यंत शक्तिशाली प्रक्रिया है। इसे बिना मार्गदर्शन के करना जोखिमपूर्ण हो सकता है। योगाचार्य या अनुभवी गुरु के निर्देशन में ही इस साधना को करना चाहिए।
📞 संपर्क करें
आचार्य हरीश
मोबाइल: 9315835440
आपके आध्यात्मिक मार्गदर्शन के लिए सदैव उपलब्ध।
क्या आपने कभी सोचा है! ‘नवरात्रि’ क्यों कहा जाता हैं? ‘नवदिन’ क्यों नहीं!
अक्सर हम उत्सव की चकाचौंध में इसके पीछे के ‘लॉजिक’ को भूल जाते हैं। देवी की पूजा तो हम सुबह भी करते हैं, फिर नाम सिर्फ ‘रात’ पर ही क्यों आधारित है?
इसके पीछे कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्राचीन विज्ञान (Ancient Science) और मनोविज्ञान (Psychology) का एक अद्भुत संगम है। आइए, इसके 4 मुख्य कारणों पर एक नज़र डालते हैं:
1. डार्क मोड: सृजन का ‘कंट्रोल रूम’
प्रकृति का एक दिलचस्प नियम है—हर बड़ी चीज़ का जन्म अंधेरे में होता है।
- बीज (Seed): धरती के नीचे अंधेरे में अंकुरित होता है।
- गर्भ (Womb): माँ के पेट के अंधेरे में जीवन आकार लेता है।
- कोशिकाएं (Cells): विज्ञान कहता है कि शरीर की रिपेयरिंग और ग्रोथ सबसे ज्यादा रात को सोते समय होती है।
👉 अगर आपको खुद को अंदर से ‘रीसेट’ करना है, तो दिन के शोर में नहीं, रात की शांति में उतरना होगा। इसीलिए ये ‘नवरात्रि’ है।
2. ब्रह्मांडीय फ्रीक्वेंसी (Cosmic Frequency)
दिन के समय सूर्य की किरणें, रेडियो तरंगें और शोर-शराबा हमारे दिमाग के लिए ‘डिस्टरबेंस’ (Noise) की तरह होते हैं।
- रात में वातावरण शांत होता है, जिससे हमारे संकल्प और मंत्रों की ‘वाइब्रेशन’ कई गुना बढ़ जाती है।
- इन नौ रातों में पृथ्वी की स्थिति ऐसी होती है कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) सीधे हमारे Nervous System पर असर डालती है। यह साधना के लिए ‘गोल्डन टाइम’ है।
3. ‘रात्रि’ शब्द का डिकोडिंग (Decoding the word)
संस्कृत में ‘रात्रि’ का अर्थ सिर्फ ‘रात’ नहीं है:
- ‘रा’ = देने वाली।
- ‘त्रि’ = तीन दुखों (शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक) से मुक्ति।
दिन ‘कर्म’ (कामकाज और तनाव) का प्रतीक है, जबकि रात्रि ‘विश्राम’ और ‘हीलिंग’ (Healing) का। यह वह समय है जो आपको शांति देकर आपके दुखों को सोख लेता है।
4. इंटरनल ‘रिबूट’ प्रोसेस ⚙️
नवरात्रि हमारे भीतर के तीन सॉफ्टवेयर (त्रिगुणों) को बैलेंस करने का समय है:
- तमोगुण (Tamoguna): आलस्य और गुस्से को डिलीट करना।
- रजोगुण (Rajoguna): भाग-दौड़ और बेचैनी को पॉज (Pause) करना।
- सतोगुण (Satvaguna): ज्ञान और शांति को अपडेट करना।
यह एक गहरा ‘मेंटल ऑपरेशन’ है, जिसे शांति और एकांत में ही अंजाम दिया जा सकता है।
अंतिम और महत्वपूर्ण बात
हमारे पूर्वज जानते थे कि असली बदलाव बाहर की भीड़ में नहीं, बल्कि भीतर की गहराई में आता है। इसीलिए उन्होंने इसे ‘नवरात्रि’ कहा-ताकि आप नौ रातों तक अपनी अंतरात्मा में उतरें और दसवें दिन एक नया और ऊर्जावान स्वरूप लेकर बाहर निकलें।
कुण्डलिनी जागरण के 3 संभावित खतरे
कुण्डलिनी जागरण जितना रहस्यमयी है उतना खतरनाक भी हो सकता है यदि योग्य गुरु के सानिध्य में न किया जाए।
कई बार लोग वीडियो देख कर, किताबें पढ़ कर खुद से कुंडलिनी जैसी सूक्ष्म क्रियाएं करने लगता है। जिससे उन्हें फायदा होने कि बजाय उल्टा नुकसान होने लगता है। यहां नुकसान कुंडलिनी नहीं करती बल्कि गलत जानकारी करती है। क्योंकि गलत जानकारी या सही जानकारी न होने के कारण आप कुण्डलिनी को सही तरह से हैंडल नहीं कर पाते और इससे कई बार परेशानी इतनी अधिक हो जाती है कि उससे निपटना मुश्किल हो जाता है।
कुंडलिनी जागरण के 3 खतरे
- शरीर में ऊर्जा का अचानक बढ़ जाना। अचानक नाभि के आसपास ऊर्जा इतनी अधिक बढ़ जाती है कि उसे संभालना मुश्किल हो जाता है। इस ऊर्जा को जब सही रास्ता नहीं मिलता तो यह ऊर्जा पूरे शरीर में फैलने लगती है। बहुत सारे साधकों को पावो के तलवों में जलन होने लगती है जो दवाई इत्यादि लेने पर भी नहीं जाती।
- शरीर में कई अंगों पर झटके लगने लगते है। यह झटके आमतौर पर मणिपुर चक्र के आसपास से शुरू होता है। फिर यह पूरे शरीर में कही पर ही लगने लगता है। जानकारी न होने के कारण साधक इन झटकों से डर जाता है। इस वजह से आगे की यात्रा भी रुक जाती है। यानि फायदा होने की बजाए नुकसान होने लगता है।
- कुंडलिनी जब बिगड़ कर स्वाधिष्ठान चक्र पर अपनी ऊर्जा बिखेरने लगती है तो उसकी वजह से आपके आपसी संबंध बिगड़ने लगते हैं। आपको समझ ही नहीं आता कि यह हो क्यों रहा है और बहुत कोशिश करने के बाद भी आप इसे रोक ही नहीं पाते।
इसके अतिरिक्त और भी बहुत सारी काम्पलीकेशंस साधकों के साथ घटित होती है। जिनका समाधान सांसारिक नहीं होता बल्कि कुछ सूक्ष्म क्रियाएं होती है जो साधक के अनुभव के आधार पर गुरु ही आपको बता सकता है।
मेरे पास दुनियां भर से कुण्डलिनी के बिगड़े हुए कई केसेस आते है। ज्यादातर केसेज वैसे ही होते है जो हमने ऊपर डिस्कस किये है। कई साधक तो बहुत ही परेशान होते है। हालांकि सभी तरह की कुण्डलिनी की समस्याओं का निदान हमारे द्वारा हो जाता है। लेकिन हमें दुख होता है कि लोग खुद से कुण्डलिनी उठाने का जोखिम आज भी लेते है।
याद रखिए कि कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया में आपको नियमित रूप से गाइडेंस की आवश्यकता पड़ती है। यानि हर पड़ाव पर आपको आगे की यात्रा के लिए नए निर्देशों की आवश्यकता होती है। लेकिन आश्चर्य है कि साधक बिना कुछ जाने खुद से ही करने लगते है।
कुंडलिनी जागरण कभी भी बिना गुरु के बिना सानिध्य के नहीं करें। इस संदर्भ में आप हमसे भी संपर्क कर सकते है।
इन सेवाओं के लिए हमारा व्हाटसअप नंबर 9315835440 पर आप संपर्क कर सकते है।
मूलाधार चक्र ही ध्यान भटकाता है – जानिए क्यों?
मूलाधार चक्र

मूलाधार चक्र की 4 पंखुड़ियां होती है. इन चार पंखुड़ियों पर होती है 4 शक्तियां. इन शक्तियों में इतना आकर्षण होता है कि हमारी इन्द्रियों को इस संसार की ओर आकर्षित किए रखती है. संसार के जितने भी आकर्षणों के प्रति हम आकर्षित होते है उनके पीछे मूलाधार चक्र की शक्तियां काम कर रही होती है. कभी एक शक्ति तो कभी एक से अधिक शक्तियां हमारी सभी इच्छाओं के पीछे काम कर रही होती है.
हमारा मन
हमारा मन सबसे अधिक इसी चक्र से attached रहता है. यानि मन का कार्य एक तरह से इंसान को मूलाधार चक्र की शक्तियों के साथ लगातार जोड़े रखना होता है. इसलिए ही मन लगातार इस तरह के विचार पैदा करता रहता है. मूलाधार चक्र सबसे रहस्यमय है. रहस्यमयी शक्तियों से भरपूर चक्र के पास Positive और Negative दोनों तरह की शक्तियां विद्यमान होती है.
ध्यान और मन
ध्यान में अगर कोई चक्र सबसे अधिक भटकाता है तो वो है मूलाधार चक्र. ध्यान के दौरान सबसे अधिक विचार भी यही चक्र उत्पन्न करता है. जब आप ध्यान करते है तो यह महसूस कर सकते है और यह बात समझ सकते है कि अधिकतर विचार मूलाधार चक्र से संबंधित ही दिमाग में आ रहे है.
मूलाधार चक्र का तत्व
हर चक्र के बीचो बीच होता है उसका तत्व. मूलाधार चक्र का तत्व है पृथ्वी. पृथ्वी तत्व का रंग पीला होता है और इसे पीले रंग के एक वर्ग से प्रदर्शित किया जाता है. हर चक्र के तत्व की खासियत होती है कि वो उस चक्र को बैलेंस कर सकता है.
मूलाधार चक्र जब असंतुलित हो जाता है तो इसके तत्व पृथ्वी के माध्यम से ही इसे संतुलित किया जाता है.
कुण्डलिनी जागरण और समय की चुनौती
कुण्डलिनी को समझना आवश्यक है
कुण्डलिनी जागरण केवल एक आध्यात्मिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह विचारों और समय के बंधन से मुक्ति की यात्रा भी है। शब्द कुण्डलिनी जितना सरल लगता है, उसका जागरण उतना ही गहन और रहस्यमय है।
साधना की शुरुआत हमेशा मन को एकाग्र करने से होती है। जब साधक अपने भीतर एक ऐसा स्थान बना लेता है जहाँ विचारों का आक्रमण उसे विचलित न कर सके, तभी साधना का वास्तविक आधार तैयार होता है। इस अभ्यास से मन शुद्ध होता है और धीरे-धीरे चेतना का उदय होता है।
विचारों से संघर्ष
चेतना और चक्रों की यात्रा
जब चेतना उत्पन्न होती है, साधक अपने ही मन से अलगाव का अनुभव करता है। यही चेतना मूलाधार चक्र पर केंद्रित होकर कुण्डलिनी को जागृत करती है। जैसे-जैसे कुण्डलिनी विभिन्न चक्रों को पार करती है, चेतना का स्वरूप बदलता जाता है और साधक को आगे की आध्यात्मिक यात्रा पर ले जाता है।
विचारों पर विजय प्राप्त करने के बाद अगली चुनौती होती है—समय। ध्यान के दौरान बार-बार घड़ी देखने की इच्छा, समय का अहसास कराना—ये सब संकेत हैं कि समय भी साधना में बाधक बन सकता है। समय चेतना को बाहर की ओर खींचता है और साधक को वर्तमान में बाँधकर रखता है।
समय की बाँधा
समाधान
- सबसे पहला उपाय है सजगता। जब साधक यह जान लेता है कि समय भी ध्यान भंग कर सकता है, तो वह उसके प्रति सतर्क हो जाता है। यही जागरूकता समय की बाँधा से मुक्ति का मार्ग है।
- दूसरा उपाय है श्वास का रहस्य। सांसों को समझना और उनके प्रवाह में एकाग्र होना साधक को समय से परे ले जाता है। जब यह रहस्य खुलता है, तब साधक समय को लांघकर उस खेल से बाहर निकल जाता है जिसमें वह बंधा हुआ था। यही क्षण Self-Realization का होता है।
“क्या आपने ध्यान साधना में समय की बाँधा का अनुभव किया है? अपने विचार कमेंट में साझा करें।”